अमेरिका में नौकरी और करियर बनाने का सपना देख रहे भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए ट्रंप प्रशासन के नए H-1B वीजा प्रस्ताव ने चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने H-1B वीजा आवेदन से जुड़ी 103,265 डॉलर की नई फीस का प्रस्ताव रखा है। अगर इसे अंतिम मंजूरी मिल जाती है, तो अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों पर बड़ा अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
साल के अंत तक अंतिम रूप दे सकता है प्रशासन
DHS ने प्रस्ताव को फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया है। प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद नई फीस स्थायी रूप से लागू हो सकती है। ट्रंप प्रशासन इसे साल के अंत तक अंतिम रूप देने की तैयारी में है।
यह प्रस्ताव सितंबर 2025 में घोषित 1 लाख डॉलर की H-1B फीस से जुड़े विवाद के बाद आया है। उस मामले में अमेरिकी अदालत ने जून 2026 में शुल्क बढ़ाने वाले नियम को रोक दिया था। मौजूदा रोक की अवधि 21 सितंबर को समाप्त होने वाली है।
DHS का कहना है कि नई फीस का उद्देश्य कानूनी इमिग्रेशन सिस्टम के प्रशासनिक खर्चों की भरपाई के लिए सरकार को अतिरिक्त राजस्व उपलब्ध कराना है।
किन H-1B आवेदनों पर लगेगी फीस?
प्रस्तावित 103,265 डॉलर की फीस कैप-सब्जेक्ट H-1B याचिकाओं पर लागू होगी। अमेरिका में हर वित्तीय वर्ष सामान्य H-1B वीजा के लिए 65,000 की सीमा है। इसके अलावा अमेरिकी संस्थानों से एडवांस्ड डिग्री हासिल करने वाले विदेशी कर्मचारियों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा उपलब्ध होते हैं।
वहीं, विश्वविद्यालयों और कुछ गैर-लाभकारी संस्थानों की ओर से दाखिल किए जाने वाले कैप-एग्जेम्प्ट H-1B आवेदन इस अतिरिक्त फीस से बाहर रहेंगे।
सरकार को मिल सकता है 8.8 अरब डॉलर का राजस्व
DHS के अनुमान के अनुसार करीब 85,000 H-1B याचिकाओं पर यह फीस लगने से सरकार को लगभग 8.8 अरब डॉलर का राजस्व प्राप्त हो सकता है। इस राशि का इस्तेमाल DHS के अलावा श्रम विभाग, विदेश विभाग और न्याय विभाग जैसी एजेंसियों के कानूनी इमिग्रेशन सिस्टम से जुड़े खर्चों की भरपाई के लिए किया जा सकता है।
भारतीय प्रोफेशनल्स पर क्यों पड़ेगा असर?
H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को टेक्नोलॉजी, रिसर्च, शिक्षा और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। भारतीय प्रोफेशनल्स इस वीजा कार्यक्रम के प्रमुख लाभार्थियों में शामिल हैं। ऐसे में फीस में भारी बढ़ोतरी का असर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, छात्रों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है।
पहले H-1B से जुड़ी फीस आम तौर पर कुछ हजार डॉलर के स्तर पर होती थी। प्रस्तावित $103,265 शुल्क उसके मुकाबले कई गुना अधिक है। यदि नियम लागू होते हैं, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की लागत काफी बढ़ सकती है और इसका असर भविष्य की भर्ती पर भी पड़ने की आशंका है।