भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश की स्मृति में मनाए जाने वाले धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस एवं आषाढ़ पूर्णिमा के पावन अवसर पर वाराणसी के सारनाथ स्थित मूलगंध कुटी विहार में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। “धम्मचक्क पवत्तन दिवस का महत्व” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में भारत सहित श्रीलंका, नेपाल, थाईलैंड और अन्य देशों से आए बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों, शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस आयोजन ने सारनाथ को एक बार फिर वैश्विक बौद्ध चिंतन और संवाद का प्रमुख केंद्र बना दिया।
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) तथा महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, सारनाथ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी का उद्देश्य भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश, धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाना है। कार्यक्रम में महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, सारनाथ के अध्यक्ष वेन. आर. सुमित्थानंद थेरो सहित अनेक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु और विद्वान उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बौद्ध भिक्षुओं का सम्मान करते हुए कहा कि राज्य सरकार सारनाथ को विश्वस्तरीय बौद्ध पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध की तपोभूमि और प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ की ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए पर्यटन सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है, ताकि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बेहतर अनुभव मिल सके।
मंत्री ने कहा कि सारनाथ को विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई मिली है। उन्होंने बताया कि सारनाथ अब भारत का 45वां और उत्तर प्रदेश का चौथा विश्व धरोहर स्थल बन चुका है। लगभग 28 वर्षों बाद मिली इस उपलब्धि से प्रदेश की बौद्ध विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। अब तक ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी जैसे विश्व धरोहर स्थल आगरा क्षेत्र तक सीमित थे, लेकिन सारनाथ के जुड़ने से पूर्वांचल भी विश्व धरोहर मानचित्र पर मजबूती से स्थापित हुआ है।
उन्होंने विश्वास जताया कि सारनाथ की वैश्विक पहचान मजबूत होने से धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को नई गति मिलेगी। साथ ही भगवान बुद्ध के शांति, करुणा और मानवता के संदेश को दुनिया के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी।
संगोष्ठी के दौरान महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा मूल पाली भाषा से संस्कृत में अनूदित धम्मपद का लोकार्पण किया गया। इसके साथ ही प्रो. सिद्धार्थ सिंह की पुस्तक “युगपुरुष कोसेत्सु नोसु को स्मरण करते हुए” का भी विमोचन हुआ। कार्यक्रम की रूपरेखा प्रो. विमलेंद्र कुमार ने प्रस्तुत की। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के निदेशक डॉ. राकेश सिंह, वेन. के. सिरी सुमेधा थेरो, प्रो. आर. एम. पाठक, तरुणेश बौद्ध, प्रो. उज्ज्वल कुमार तथा प्रो. सिद्धार्थ सिंह सहित अनेक विद्वानों ने बौद्ध दर्शन, संस्कृति और धम्म के वैश्विक महत्व पर अपने विचार रखे।
संगोष्ठी के दूसरे दिन तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनमें देश-विदेश के विद्वान धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस, बौद्ध दर्शन, करुणा, अहिंसा और समकालीन समाज में बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे। इन सत्रों में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, नवनालंदा महाविहार, केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान (CIHTS), स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय और महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञ भाग लेंगे।
धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी न केवल बौद्ध दर्शन और संस्कृति के प्रचार-प्रसार का महत्वपूर्ण मंच बन रही है, बल्कि सारनाथ को वैश्विक बौद्ध अध्ययन, शोध और धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।