तमिलनाडु में भाषा को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन कृषि मंत्री एमआरके पन्नीरसेल्वम का ताजा बयान एक बार फिर इस बहस को केंद्र में ले आया है। उत्तर भारतीय प्रवासी श्रमिकों को लेकर की गई टिप्पणी ने न सिर्फ सामाजिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ भी गहरे माने जा रहे हैं।
मंत्री ने उत्तर भारत से आए लोगों को कम कौशल वाले कामों से जोड़ते हुए दो-भाषा नीति को तमिलनाडु की सफलता का आधार बताया। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह बयान श्रम की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है और प्रवासी श्रमिकों के योगदान को नजरअंदाज करता है। हकीकत यह है कि तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था में उत्तर भारतीय मजदूरों की अहम भूमिका रही है, चाहे वह निर्माण क्षेत्र हो या औद्योगिक उत्पादन।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ हफ्ते पहले उद्योग मंत्री टीआरबी राजा ने अपेक्षाकृत संतुलित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि राज्य में किसी को भी हिंदी बोलने से नहीं रोका जाता और जर्मन-जापानी नागरिक भी यहां सहजता से रह रहे हैं। ऐसे में कृषि मंत्री का बयान पार्टी लाइन से अलग और ज्यादा आक्रामक माना जा रहा है।
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राजनीतिक जानकारों के अनुसार, डीएमके की रणनीति पारंपरिक द्रविड़ पहचान और भाषा नीति को मजबूत करने की हो सकती है। चुनावी माहौल में इस तरह के बयान भावनात्मक मुद्दों को उभारते हैं, जिससे क्षेत्रीय समर्थन मजबूत किया जा सके। वहीं विपक्ष इसे राष्ट्रीय एकता के खिलाफ बयान बताकर हमलावर रुख अपना सकता है।
भाषा और रोजगार का यह विवाद सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहने वाला। उत्तर भारत में भी इस बयान पर प्रतिक्रिया आ सकती है, जिससे केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ने की आशंका है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा चुनावी बहस का बड़ा हथियार बन सकता है।