मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को मुंबई में आयोजित ‘इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस’ (IIMUN) कार्यक्रम में छात्रों के साथ संवाद करते हुए शिक्षा, बेरोजगारी, आरक्षण, सोशल मीडिया, LGBTQIA+ समुदाय और भारत के पड़ोसी देशों से रिश्तों सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार साझा किए। उनके बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
Gen-Z के विरोध-प्रदर्शनों पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि आंदोलन भी संवाद का एक माध्यम है और युवाओं की बात सुनना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी तार्किक जवाब चाहती है और केवल आदेश मानने वाली सोच अब बदल चुकी है। उन्होंने Gen-Z और Gen Alpha को ईमानदार पीढ़ी बताते हुए कहा कि उन्हें राष्ट्रविरोधी कहना उचित नहीं है, बल्कि उनके साथ संवाद बढ़ाने की जरूरत है।
आरक्षण पर उन्होंने कहा कि इसकी मूल भावना को समझने के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक समाज में भेदभाव रहेगा, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। हालांकि उन्होंने इसे स्थायी व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक उत्थान का माध्यम बताया।
समलैंगिक विवाह पर संघ प्रमुख ने कहा कि LGBTQIA+ समुदाय समाज का हिस्सा है और उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विवाह भारतीय समाज में परिवार संस्था की नींव है, इसलिए इसमें किसी भी बदलाव से पहले व्यापक सामाजिक चर्चा आवश्यक है। उन्होंने समलैंगिक साथियों के लिए अलग कानूनी व्यवस्था पर विचार करने की बात भी कही।
बेरोजगारी के मुद्दे पर मोहन भागवत ने कहा कि रोजगार का मतलब केवल सरकारी या निजी नौकरी नहीं, बल्कि उद्यमिता और कौशल आधारित कार्य भी है। उन्होंने समाज में श्रम के प्रति सम्मान बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि मानसिकता बदलने से रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
भारत के चीन और पाकिस्तान से संबंधों पर उन्होंने कहा कि संघर्ष के समय सरकार की नीति का समर्थन करना चाहिए, लेकिन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों को स्थायी दुश्मनी में नहीं बदलना चाहिए। उन्होंने कहा कि संघर्ष समाप्त होने के बाद संवाद और संबंधों को आगे बढ़ाना ही बेहतर रास्ता है।