- तेलंगाना की सियासत में गरमाया बयानबाज़ी का दौर,
- अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान से BJP-कांग्रेस आमने-सामने
- AIMIM, BJP और कांग्रेस के बीच तेज हुआ आरोप-प्रत्यारोप
तेलंगाना की राजनीति एक बार फिर तीखी बयानबाज़ी के कारण सुर्खियों में आ गई है। AIMIM नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की तुलना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से करते हुए बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। उनके बयान के बाद राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है।
एक जनसभा को संबोधित करते हुए अकबरुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया कि तेलंगाना और उत्तर प्रदेश दोनों जगह मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जहां यूपी में बुलडोजर कार्रवाई चर्चा में रहती है, वहीं तेलंगाना में धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। AIMIM का दावा है कि कांग्रेस और BJP की नीतियों में मुसलमानों के मुद्दों पर कोई वास्तविक अंतर नहीं है।
अपने भाषण में ओवैसी ने कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा कि मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के लिए लंबे समय तक सत्ता में रही पार्टियां जिम्मेदार हैं। उन्होंने समुदाय से किसी भी राजनीतिक दल पर आंख बंद करके भरोसा न करने की अपील की और AIMIM को मुसलमानों की आवाज़ बताने की कोशिश की।
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इस बयान के बाद BJP नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि ओवैसी समाज में विभाजनकारी राजनीति कर रहे हैं और युवाओं को भड़काने वाले बयान दे रहे हैं। वहीं कांग्रेस नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि कट्टर राजनीति को बढ़ावा देने में ओवैसी और भाजपा की विचारधारा एक जैसी दिखाई देती है।
राजनीतिक विवाद उस समय और बढ़ गया जब AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर भी BJP को घेरा। उन्होंने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की आलोचना करते हुए गाजा में हुई मौतों के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया और केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेलंगाना में आगामी राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए बयानबाज़ी और तेज हो सकती है। AIMIM जहां अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं BJP और कांग्रेस दोनों इस मुद्दे को अलग-अलग तरीके से भुनाने में जुटी हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर दोनों तरफ से राजनीतिक दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बयानबाज़ी का असर तेलंगाना की आगामी राजनीति और चुनावी रणनीतियों पर किस तरह पड़ता है।