झूठे वादे और सहमति का सवाल-सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से उठा कानूनी मुद्दा

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शादी का झांसा देकर दुष्कर्म के आरोप से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि विवाह से पहले किसी भी रिश्ते में भरोसा करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि कानूनी रूप से दोनों पक्ष एक-दूसरे के लिए अजनबी होते हैं।

यह टिप्पणी जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने यह भी कहा कि हर आपसी सहमति से बने संबंध को बाद में आपराधिक विवाद में नहीं बदला जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि शुरुआत से ही धोखे का इरादा था।

सहमति और धोखे का अंतर

कानून में ‘सहमति’ और ‘धोखे से प्राप्त सहमति’ के बीच स्पष्ट अंतर माना जाता है। यदि किसी महिला को झूठे वादे के आधार पर संबंध के लिए राजी किया गया हो और आरोपी का इरादा शुरू से ही शादी न करने का रहा हो, तो यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

मौजूदा मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि युवक ने शादी का भरोसा देकर उसे दुबई बुलाया और संबंध बनाए। बाद में उसे पता चला कि आरोपी पहले से शादीशुदा था।

इससे पहले Delhi High Court ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि रिकॉर्ड से यह संकेत मिलता है कि वादा वास्तविक नहीं था।

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सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह मामला प्रथम दृष्टया आपसी सहमति का प्रतीत होता है और इसे मध्यस्थता के लिए भेजा जा सकता है। अदालत ने दोनों पक्षों को समझौते की संभावना पर विचार करने का सुझाव दिया है।

यह मामला केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और कानूनी विमर्श का हिस्सा बन गया है। अदालत की टिप्पणी का उद्देश्य युवाओं को सावधानी की सीख देना और कानूनी प्रक्रिया का संतुलन बनाए रखना है। अगली सुनवाई बुधवार को तय की गई है, जिसमें आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।

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