POCSO केस में शब्दों की संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

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नई दिल्ली। बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक भाषा की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर स्वत: संज्ञान लिया है, जिसमें POCSO के गंभीर आरोपों को “छेड़छाड़” की श्रेणी में रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में शब्दों का चयन पीड़ित की गरिमा और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

यह मामला 11 वर्षीय बच्ची से जुड़ा है, जिसे आरोपी पुलिया के नीचे ले गया और उसके साथ अश्लील हरकत करने की कोशिश की। बावजूद इसके, हाईकोर्ट के फैसले में कुछ टिप्पणियों ने यह संकेत दिया कि बच्ची की सहमति को आरोपी के पक्ष में देखा गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई।

‘पीड़ित सबसे अहम’

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत की प्राथमिक चिंता पीड़ित बच्ची है। उन्होंने कहा कि इस तरह के अनुभव पीड़ित के लिए जीवनभर का भावनात्मक बोझ बन जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि न्याय केवल सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि भाषा और दृष्टिकोण से भी पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए।

दिशा-निर्देश तय करने की तैयारी

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए कि वह भविष्य में अदालतों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को लेकर स्पष्ट न्यायिक दिशा-निर्देश तय कर सकता है। सीजेआई ने बार से भी इस मुद्दे पर सहयोग मांगा और कहा कि यह केवल एक तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी से जुड़ा विषय है।

प्रशिक्षण और संवेदीकरण

कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया कि न्यायाधीशों को POCSO जैसे मामलों में विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि फैसलों में इस्तेमाल की गई भाषा उम्र-अनुकूल, संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित हो।

हैंडबुक पर टिप्पणी

2021 में जारी की गई हैंडबुक पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अत्यधिक जटिल भाषा में थी। सीजेआई ने कहा कि भविष्य की गाइडलाइंस में सामाजिक लोकाचार, सांस्कृतिक संवेदनाएं और व्यावहारिक परिस्थितियां भी शामिल होनी चाहिए।

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