“संघ सत्ता या राजनीति नहीं, समाज निर्माण का अभियान है” – मोहन भागवत

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मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों की यात्रा पर आधारित “संघ यात्रा के 100 वर्ष – नए क्षितिज” कार्यक्रम में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की विचारधारा, उसकी भूमिका और हिंदू पहचान को लेकर विस्तार से अपनी बात रखी। उनका भाषण केवल संगठन तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य की दिशा पर केंद्रित था।

भागवत ने कहा कि संघ को केवल वर्दी, शाखा या रूट मार्च के नजरिये से देखना उसकी आत्मा को समझने जैसा नहीं है। संघ न तो सैन्य संगठन है और न ही कोई सांस्कृतिक मंच। यह एक सामाजिक आंदोलन है, जिसका उद्देश्य समाज में आत्मीयता और अनुशासन विकसित करना है।

संघ की भूमिका पर स्पष्टता

उन्होंने कहा कि संघ किसी के खिलाफ खड़ा नहीं होता। उसका काम समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। संघ सत्ता, प्रचार या प्रभाव की राजनीति से दूर रहकर समाज निर्माण पर ध्यान देता है। स्वयंसेवक अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं, लेकिन वह उनका व्यक्तिगत निर्णय होता है।

हिंदू शब्द की व्याख्या

मोहन भागवत ने हिंदू शब्द को लेकर गहरी व्याख्या की। उन्होंने कहा कि हिंदू कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह शब्द किसी पूजा-पद्धति या कर्मकांड तक सीमित नहीं है। भारत में रहने वाला हर व्यक्ति सांस्कृतिक रूप से इसी परंपरा का हिस्सा है।

राजनीति से दूरी

RSS प्रमुख ने स्पष्ट किया कि बीजेपी संघ की राजनीतिक शाखा नहीं है। संघ के स्वयंसेवक राजनीति में हो सकते हैं, लेकिन संगठन का लक्ष्य राजनीतिक नहीं है। संघ का फोकस समाज को नैतिक, संगठित और आत्मनिर्भर बनाना है।

समाज ही राष्ट्र का भाग्य तय करता है

उन्होंने इतिहास के उदाहरण देते हुए कहा कि किसी भी देश का उत्थान या पतन उसके समाज की स्थिति पर निर्भर करता है। जब समाज संगठित होता है, तब राष्ट्र आगे बढ़ता है। जब समाज बिखरता है, तब गिरावट शुरू होती है।

सबको साथ लेकर चलने की बात

मोहन भागवत ने कहा कि जो लोग आज संघ का विरोध करते हैं, वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं। संघ का उद्देश्य उन्हें भी साथ जोड़ना है। भारत की परंपरा किसी को छोड़ने की नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने की रही है।

धर्म, अनुशासन और भारतीय सोच

उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता शब्द की जगह पंथनिरपेक्षता ज्यादा उपयुक्त है, क्योंकि भारत की सोच सभी पंथों को समान सम्मान देती है। भारत के मुसलमान और ईसाई भी भारतीय संस्कृति से जुड़े हुए हैं।

भागवत के भाषण का सार यही रहा कि संघ न तो सत्ता की संस्था है, न राजनीति की, बल्कि समाज को जोड़ने वाला एक सतत अभियान है।

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