अफगानिस्तान युद्ध को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि NATO की एकता पर सीधा सवाल बन गया है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की तीखी प्रतिक्रिया इस बात का संकेत है कि यूरोप अब सहयोगी देशों की भूमिका को हल्के में लिए जाने को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
मेलोनी का सोशल मीडिया पोस्ट भावनात्मक होने के साथ-साथ तथ्यात्मक भी है। उन्होंने याद दिलाया कि 9/11 के बाद NATO देशों ने अमेरिका के साथ खड़े होकर अभूतपूर्व एकजुटता दिखाई थी। इटली का योगदान केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि जमीनी स्तर पर सक्रिय और जोखिम से भरा था।
अफगानिस्तान में रीजनल कमांड वेस्ट की जिम्मेदारी संभालना यह दर्शाता है कि इटली सिर्फ समर्थन देने वाला देश नहीं, बल्कि मिशन का एक अहम स्तंभ था। 53 सैनिकों की शहादत और सैकड़ों घायलों का जिक्र यह साफ करता है कि इटली ने इस युद्ध की भारी कीमत चुकाई। ट्रंप का यह कहना कि NATO सहयोगी फ्रंटलाइन पर नहीं थे, यूरोपीय नेताओं को इसलिए भी चुभा क्योंकि इससे दशकों की सैन्य साझेदारी और भरोसे पर सवाल उठते हैं। मेलोनी ने स्पष्ट कर दिया कि दोस्ती केवल साझा हितों से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान से भी चलती है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद अमेरिका और यूरोप के बीच पहले से मौजूद तनाव को और उजागर करता है। एक ओर ट्रंप “अमेरिका फर्स्ट” की सोच को आगे बढ़ाते हैं, वहीं यूरोपीय देश सामूहिक सुरक्षा और साझा जिम्मेदारी पर जोर देते हैं।
मेलोनी की प्रतिक्रिया यह भी दिखाती है कि NATO के भीतर नेतृत्व और योगदान को लेकर बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है। अफगानिस्तान युद्ध भले ही समाप्त हो चुका हो, लेकिन उसकी राजनीतिक गूंज आज भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित कर रही है।