प्रयागराज में माघ मेला के दौरान शुरू हुआ विवाद अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच टकराव का रूप ले चुका है। सीएम योगी के ‘कालनेमी’ वाले बयान के बाद शंकराचार्य ने न सिर्फ कड़ा विरोध दर्ज कराया है, बल्कि सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मौनी अमावस्या से संगम किनारे धरने पर बैठे हैं। उन्होंने यह साफ कर दिया है कि जब तक उनके साथ हुए कथित अपराध का संज्ञान नहीं लिया जाता, तब तक वह किसी भी प्रकार का स्नान नहीं करेंगे। बसंत पंचमी के स्नान से इनकार करना उनके विरोध का प्रतीक माना जा रहा है।
‘नकली-असली संत की राजनीति’
शंकराचार्य का कहना है कि सरकार नकली और असली सनातन की बात कर रही है, जबकि असली मुद्दे से ध्यान भटकाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन की दुर्भावना के चलते उन्हें नोटिस भेजा गया। उनका कहना है कि वह वर्षों से माघ मेले में आते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्हें फुटपाथ पर बैठने के लिए मजबूर किया गया।
उन्होंने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि सत्ता में रहते हुए भी कई गंभीर मुद्दों पर सरकार असफल रही है। ऐसे में संतों पर उंगली उठाने से पहले आत्ममंथन जरूरी है।
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नोटिस ने बढ़ाया विवाद
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य की पालकी रोके जाने के बाद विवाद ने तूल पकड़ लिया। मेला प्रशासन ने पहले उनसे पहचान से जुड़े सवाल पूछे और फिर नोटिस जारी किया। इसके बाद दूसरा नोटिस भेजकर बैरियर तोड़ने और भीड़ में बग्घी ले जाने का आरोप लगाया गया।
नोटिस में यह चेतावनी भी दी गई कि यदि 24 घंटे के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, तो माघ मेले में दी गई सभी सुविधाएं वापस ली जा सकती हैं।
CM योगी के बयान की पृष्ठभूमि
सीएम योगी ने हाल ही में कहा था कि संन्यासी और संत के लिए धर्म और राष्ट्र सर्वोपरि होते हैं और कुछ लोग धर्म की आड़ में सनातन को कमजोर करने की साजिश कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को ‘कालनेमी’ बताते हुए सतर्क रहने की बात कही थी। इसी बयान को लेकर अब विवाद गहरा गया है।
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सियासत भी हुई तेज
इस पूरे मामले पर राजनीति भी गरमा गई है। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य से स्नान करने और विवाद को समाप्त करने की अपील की है। वहीं विपक्ष भी सरकार पर संतों के अपमान का आरोप लगा रहा है।
माघ मेला से जुड़ा यह विवाद अब केवल स्नान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासन, राजनीति और धर्म के टकराव का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।