विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका के अलग होने के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और स्वास्थ्य नीति दोनों में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका ने आधिकारिक घोषणा करते हुए WHO की सदस्यता समाप्त कर दी है, जिसके बाद जिनेवा स्थित संगठन के मुख्यालय से अमेरिकी झंडा हटा लिया गया। यह कदम अमेरिका की वैश्विक स्वास्थ्य नीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त बयान में कहा कि अमेरिका अब WHO के साथ केवल सीमित तकनीकी सहयोग करेगा, ताकि अलग होने की प्रक्रिया सुचारु रूप से पूरी हो सके। इसके अलावा अमेरिका किसी भी रूप में संगठन से जुड़ा नहीं रहेगा।
कोविड-19 बना सबसे बड़ा कारण
अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि कोविड-19 महामारी के दौरान WHO पूरी तरह विफल साबित हुआ। अमेरिका का कहना है कि संगठन ने समय पर पारदर्शिता नहीं दिखाई और कई अहम जानकारियों को नजरअंदाज किया। इसी वजह से लाखों लोगों की जान गई और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ।
डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही WHO पर चीन के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया था। उनके अनुसार, संगठन ने महामारी की शुरुआत में सख्त कदम उठाने में देरी की।
अब कैसी होगी अमेरिकी रणनीति?
WHO से बाहर निकलने के बाद अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह स्वास्थ्य सुरक्षा के मुद्दों पर सीधे देशों से संपर्क करेगा। बीमारियों की निगरानी, रिसर्च और मेडिकल डेटा साझा करने के लिए अमेरिका बहुपक्षीय संस्थाओं की जगह द्विपक्षीय समझौतों को प्राथमिकता देगा।
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अमेरिकी स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी और अमेरिका अपने संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर सकेगा।
WHO और बकाया राशि का विवाद
WHO ने कहा है कि अमेरिका पर लगभग 26 करोड़ डॉलर का बकाया है, जो 2024 और 2025 के लिए तय योगदान से जुड़ा है। संगठन का दावा है कि बिना भुगतान के सदस्यता समाप्त करना अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ है। वहीं अमेरिका ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि WHO को दी गई फंडिंग का पर्याप्त लाभ नहीं मिला और संगठन की कार्यशैली में पारदर्शिता की कमी रही।
विशेषज्ञों की चिंता
वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अमेरिका के इस फैसले को चिंताजनक बताया है। उनका कहना है कि अमेरिका जैसे बड़े देश के बाहर निकलने से WHO की वित्तीय स्थिति कमजोर होगी। इसके साथ ही, महामारी से लड़ने के लिए वैश्विक समन्वय पर भी असर पड़ेगा।
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के ग्लोबल हेल्थ विशेषज्ञ लॉरेंस गोस्टिन ने इसे अमेरिकी कानून और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे के लिए झटका बताया है।
अब सभी की नजर WHO की आगामी कार्यकारी बोर्ड बैठक पर है, जहां इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है।