लखनऊ। भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश में पखावज की गंभीर और साधनात्मक गूंज को स्वर देने वाले डॉ. राज खुशीराम का बुधवार रात निधन हो गया। उनके जाने से ध्रुपद परंपरा, पखावज वादन और गुरु-शिष्य संस्कृति को गहरा आघात पहुंचा है। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और सांस लेने में कठिनाई से पीड़ित थे।
डॉ. राज खुशीराम अवधी और अयोध्या घराने की गौरवशाली परंपरा के संवाहक थे। उन्होंने स्वामी पागल दास जैसे महान गुरु से दीक्षा लेकर पखावज को केवल वाद्य नहीं, बल्कि साधना का माध्यम बनाया। वे भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक भी रहे और अनेक शिष्यों को प्रशिक्षण देकर भारतीय संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाया।
उनकी पहचान एक सधे हुए संगतकार के साथ-साथ उत्कृष्ट एकल कलाकार के रूप में थी। अंतरराष्ट्रीय ध्रुपद मेला, वाराणसी के स्वर्ण जयंती समारोह में उन्हें काशी नरेश अनंत नारायण सिंह द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्हें जयपुर सहित कई प्रतिष्ठित मंचों पर जीवन पर्यंत सम्मान प्राप्त हुआ।
संगीत के साथ उनका व्यक्तित्व भी उतना ही सरल, सौम्य और अनुशासित था। वरिष्ठ कलाकारों के अनुसार, वे केवल मंच पर ही नहीं, बल्कि जीवन में भी संगीत की मर्यादा को जीते थे। लॉकडाउन के कठिन समय में उनका विश्व शांति हेतु किया गया पखावज वादन आज भी लोगों को प्रेरित करता है।
वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी ने उन्हें सौम्य और सदैव मुस्कराने वाला व्यक्तित्व बताया, वहीं कला समीक्षक राजवीर रतन ने इसे व्यक्तिगत और सांस्कृतिक क्षति करार दिया। रंगकर्मी गोपाल सिन्हा ने कहा कि उनका जाना कला जगत के लिए एक रिक्तता छोड़ गया है।
डॉ. राज खुशीराम का अंतिम संस्कार 18 दिसंबर को पूर्वाह्न 11 बजे बैकुंठ धाम, भैंसाकुंड में किया जाएगा। संगीत साधक के रूप में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।