देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) को चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में बड़ा वित्तीय झटका लगा है। कंपनी ने एकल आधार पर 2,661.37 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा दर्ज किया है। पिछले वर्ष की समान तिमाही में कंपनी को 5,688.60 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था, जबकि जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में उसका मुनाफा 11,377.51 करोड़ रुपये रहा था।
कंपनी के मुताबिक, इस घाटे की प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और घरेलू बाजार में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों को स्थिर रखने का फैसला रहा। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की लागत बढ़ी, लेकिन उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए खुदरा ईंधन कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की गई, जिससे कंपनी के मार्केटिंग मार्जिन पर सीधा असर पड़ा।
हालांकि, कमजोर वित्तीय नतीजों के बावजूद कंपनी का परिचालन प्रदर्शन मजबूत रहा। अप्रैल-जून तिमाही में ऑपरेशनल इनकम 26 प्रतिशत बढ़कर लगभग 2.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इस दौरान IOC ने करीब 1.91 करोड़ टन कच्चे तेल का रिफाइनिंग (प्रोसेसिंग) कर नया रिकॉर्ड बनाया। इसके साथ ही कंपनी ने 45 लाख टन पेट्रोल और करीब 1.8 करोड़ टन डीजल की रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की।
कंपनी ने बताया कि बेहतर रिफाइनरी मार्जिन, परिचालन दक्षता में सुधार और प्राकृतिक गैस की बिक्री में 11 प्रतिशत की वृद्धि ने घाटे को कुछ हद तक कम करने में मदद की। इसके अलावा वैश्विक आपूर्ति जोखिम को देखते हुए IOC ने पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई, जिससे आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव कम किया जा सका। कंपनी का कहना है कि अगले 45 से 50 दिनों तक कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर कोई बड़ी चिंता नहीं है।
IOC के चेयरमैन ए.एस. साहनी ने कहा कि कंपनी ने आम उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से ईंधन कीमतों को स्थिर रखा। उन्होंने कहा कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद परिचालन क्षमता, रिफाइनिंग प्रदर्शन और वैकल्पिक खरीद रणनीति के जरिए नुकसान को सीमित रखने का प्रयास किया गया।
शेयर बाजार में कंपनी के तिमाही नतीजों के बावजूद निवेशकों की प्रतिक्रिया संतुलित रही। बीएसई पर IOC का शेयर मामूली बढ़त के साथ 140.15 रुपये पर बंद हुआ। कंपनी का 52 सप्ताह का उच्च स्तर 188.90 रुपये और निचला स्तर 130.30 रुपये रहा, जबकि बाजार पूंजीकरण लगभग 1.98 लाख करोड़ रुपये है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहली तिमाही का घाटा मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और मूल्य नियंत्रण की नीति का परिणाम है। यदि आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं और बाजार स्थितियां सामान्य रहती हैं, तो कंपनी की वित्तीय स्थिति में सुधार संभव है। साथ ही सप्लाई डाइवर्सिफिकेशन, लागत नियंत्रण, प्राकृतिक गैस कारोबार और वैल्यू-एडेड उत्पादों पर फोकस भविष्य में IOC के प्रदर्शन को मजबूती दे सकता है।
यह परिणाम एक बार फिर दिखाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को उपभोक्ता हित और व्यावसायिक लाभ के बीच संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। अल्पकाल में ईंधन कीमतों को स्थिर रखने से आम जनता को राहत मिलती है, लेकिन इसका असर कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर साफ दिखाई देता है।