दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था अमेरिका इस समय एक बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ती नजर आ रही है। एक तरफ बढ़ते युद्ध खर्च और दूसरी ओर कच्चे तेल की रिकॉर्ड तोड़ कीमतों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर दबाव में डाल दिया है।
मध्य-पूर्व में ईरान के साथ जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावित होने से तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो गई है, जिससे ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आया है।
अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें अब 4 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुंच चुकी हैं, जबकि डीजल 5.50 डॉलर के पार चला गया है। डीजल की कीमतों में लगभग 47% की बढ़ोतरी ने ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसका असर हर जरूरी वस्तु की कीमत पर पड़ रहा है।
इस संकट का असर खेती, टेक्नोलॉजी और मेडिकल जैसे अहम क्षेत्रों पर भी साफ दिख रहा है। किसानों के लिए खाद और उर्वरकों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ गई है। टेक इंडस्ट्री को हीलियम की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जो कतर से बड़ी मात्रा में आता है।
मेडिकल सेक्टर में भी MRI मशीनों के संचालन में बाधाएं आने लगी हैं, क्योंकि इनमें इस्तेमाल होने वाली हीलियम गैस की सप्लाई प्रभावित हो रही है।
KPMG की इकोनॉमिस्ट डायने स्वोंक ने चेतावनी दी है कि यदि यह स्थिति 4-6 सप्ताह तक बनी रहती है, तो अमेरिका में मंदी आना लगभग तय है। उन्होंने विकास दर के अनुमान को घटाकर 1% कर दिया है।
विशेषज्ञों को डर है कि यह स्थिति ‘स्टैगफ्लेशन’ में बदल सकती है—एक ऐसी आर्थिक स्थिति जहां महंगाई बढ़ती है लेकिन विकास रुक जाता है। यह स्थिति 1970 के दशक में देखी जा चुकी है और इसके परिणाम बेहद गंभीर रहे थे।
हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने भरोसा जताया है कि हालात जल्द सामान्य हो जाएंगे, लेकिन आर्थिक जानकारों का मानना है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी तेल और सप्लाई चेन को सामान्य होने में काफी समय लगेगा।