बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों को लेकर सियासी और कानूनी घमासान तेज हो गया है। प्रशांत किशोर की अगुवाई वाली जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए चुनाव परिणामों की वैधता पर सवाल उठाए हैं। पार्टी ने आरोप लगाया है कि चुनाव के दौरान सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग कर मतदाताओं को प्रभावित किया गया।
जन सुराज पार्टी ने अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल याचिका में दावा किया है कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के बावजूद महिला मतदाताओं को 10-10 हजार रुपये की राशि ट्रांसफर की गई। पार्टी का कहना है कि यह चुनावी लाभ पहुंचाने का सीधा प्रयास था, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई।
याचिका के अनुसार, मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत चुनाव के समय नए लाभार्थियों को जोड़ना और भुगतान जारी करना संविधान और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के खिलाफ है। पार्टी ने तर्क दिया है कि यह कदम लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के अंतर्गत भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है।
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जन सुराज पार्टी ने मतदान केंद्रों पर जीविका स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं की तैनाती को भी गंभीर मुद्दा बताया है। पार्टी का कहना है कि करीब 1.8 लाख महिलाओं की मौजूदगी ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया और इससे मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ा।
याचिका में दावा किया गया है कि 25 से 35 लाख महिला मतदाताओं को आर्थिक लाभ मिला, जिससे मतदान के पैटर्न पर असर पड़ना स्वाभाविक था। पार्टी का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में हुए चुनाव को निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता।
अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है और शीर्ष अदालत का फैसला यह तय करेगा कि क्या बिहार में दोबारा विधानसभा चुनाव की नौबत आएगी या नहीं। अगर अदालत जन सुराज पार्टी के तर्कों को गंभीर मानती है, तो यह फैसला न सिर्फ बिहार बल्कि देश की चुनावी राजनीति के लिए भी एक अहम मिसाल बन सकता है।