स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की वाराणसी में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधे तौर पर 40 दिन का अल्टीमेटम देते हुए दो स्पष्ट मांगें रखीं—गाय को राज्यमाता का दर्जा और गोमांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध।
उनका यह बयान सिर्फ धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक टकराव का संकेत भी देता है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि उनके खिलाफ जो कार्रवाई हो रही है, वह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने खुद की तुलना 1966 के आंदोलन से करते हुए दावा किया कि तब भी सरकार ने संतों को दबाने की कोशिश की थी और आज भी हालात अलग नहीं हैं।
शंकराचार्य पद को लेकर उठे विवाद पर उन्होंने सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि प्रमाण देने के बावजूद सरकार की चुप्पी इस बात का संकेत है कि उनका दावा सही है। इसके बाद उन्होंने सवाल को सरकार की धार्मिक निष्ठा पर मोड़ दिया।
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गोमांस और मांस निर्यात का मुद्दा उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस का सबसे संवेदनशील हिस्सा रहा। उन्होंने कहा कि यूपी देश में मांस निर्यात का बड़ा केंद्र बन चुका है, जो राम और कृष्ण की भूमि की गरिमा के खिलाफ है। उनका आरोप है कि भैंस के मांस की आड़ में गोवंश का निर्यात हो रहा है, जो खुलेआम सनातन मूल्यों का उल्लंघन है।
उन्होंने यह भी कहा कि उत्तराखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने गौ माता को विशेष दर्जा दिया है, फिर उत्तर प्रदेश ऐसा क्यों नहीं कर सकता। उनके मुताबिक यह लड़ाई किसी पद या सम्मान की नहीं, बल्कि धार्मिक पहचान और आस्था की रक्षा की है।
प्रयागराज स्नान विवाद को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने साफ किया कि अब मुद्दा प्रशासनिक नहीं बल्कि वैचारिक है। उन्होंने यह तक कह दिया कि पुरानी और वर्तमान सरकारों में गौ रक्षा को लेकर कोई बुनियादी अंतर नहीं दिखता।
कुल मिलाकर, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की चेतावनी आने वाले दिनों में योगी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है, खासकर तब जब मामला सीधे धार्मिक पहचान और सनातन मूल्यों से जुड़ता हो।