लखनऊ: यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी कमेटियों के गठन को अनिवार्य बनाए जाने के बाद देशभर में इस फैसले पर बहस तेज हो गई है। इसी बीच बसपा प्रमुख मायावती ने इन नियमों का समर्थन करते हुए कहा है कि इन्हें भेदभावपूर्ण बताना पूरी तरह गलत है। उनका कहना है कि इन नियमों का असली उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में समानता को मजबूत करना है।
मायावती ने X पर अपने पोस्ट में कहा कि 2026 के नए UGC नियमों को कुछ लोग जानबूझकर गलत तरीके से पेश कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सामान्य वर्ग के कुछ लोग जातिवादी सोच के चलते इन नियमों का विरोध कर रहे हैं और इसे साजिश करार दे रहे हैं, जो न तो न्यायसंगत है और न ही सामाजिक हित में।
बसपा प्रमुख ने स्पष्ट किया कि इक्विटी कमेटियों का गठन इसलिए जरूरी है ताकि SC, ST, OBC, महिलाएं और दिव्यांग छात्रों को संस्थानों में भेदभाव का सामना न करना पड़े। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करना संविधान की भावना के अनुरूप है।
हालांकि, मायावती ने यह भी स्वीकार किया कि सरकार को इन नियमों को लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि बिना पर्याप्त संवाद के ऐसे फैसले सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकते हैं, जिससे बचना जरूरी है।
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उन्होंने दलितों और पिछड़े वर्गों से भी सतर्क रहने की अपील की और कहा कि उन्हें अपने ही समाज के कुछ स्वार्थी नेताओं के भड़काऊ बयानों से बचना चाहिए। मायावती के अनुसार, ऐसे नेता केवल राजनीतिक लाभ के लिए समाज को गुमराह करते हैं।
इस मुद्दे पर बढ़ते विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी सफाई दी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि नए इक्विटी ढांचे के तहत किसी भी छात्र या शिक्षक के साथ उत्पीड़न या भेदभाव नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि नियमों का दुरुपयोग करने की अनुमति किसी को नहीं दी जाएगी।
गौरतलब है कि UGC के 2026 नियम, 2012 के पुराने इक्विटी नियमों की जगह लेंगे, जो केवल सलाहकारी थे। नए नियमों के तहत संस्थानों को शिकायत निवारण और समावेश के लिए ठोस व्यवस्था करनी होगी, जिससे शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और समानता बढ़ने की उम्मीद है।