प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन घटी घटना अब धार्मिक विवाद से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गई है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए और साथ ही हिंदू समाज की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए।
शंकराचार्य ने कहा कि माघ मेले के इतिहास में कभी भी शंकराचार्यों को गंगा स्नान के लिए अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी। पालकी परंपरा का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ से लेकर कुंभ और माघ मेले तक यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसके बावजूद इस बार उन्हें रोका गया, जो सनातन परंपराओं का अपमान है।
उन्होंने दावा किया कि मेला प्रशासन ने उनके साथ आए बटुकों और संन्यासियों के साथ दुर्व्यवहार किया। शंकराचार्य के अनुसार, पुलिस द्वारा धक्का-मुक्की, मारपीट और जबरन अलग-थलग करने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि अगर उस दिन स्थिति और बिगड़ती तो भगदड़ जैसी घटना हो सकती थी, जिसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होती।
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इस पूरे विवाद के बीच शंकराचार्य का हिंदू समाज पर दिया गया बयान सबसे ज्यादा चर्चा में है। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज अपने धर्म और गौ रक्षा के मुद्दे पर एकजुट नहीं होता, जबकि मुसलमान अपने धर्म के लिए तुरंत खड़े हो जाते हैं। इस बयान को लेकर कई संगठनों ने नाराजगी जताई है, वहीं कुछ समर्थकों का कहना है कि शंकराचार्य ने समाज को आईना दिखाने की कोशिश की है।
शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मंडलायुक्त और पुलिस कमिश्नर पर भी निशाना साधते हुए कहा कि प्रशासन ने मीडिया को भ्रामक जानकारी दी। उन्होंने आरोप लगाया कि सीनियर अधिकारी खुद मौके पर मौजूद थे, लेकिन हालात को संभालने के बजाय स्थिति को और बिगाड़ दिया गया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं की रक्षा के लिए है। साथ ही उन्होंने ऐलान किया कि 11 मार्च को दिल्ली में गौ रक्षा को लेकर बड़ा संत सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।
फिलहाल शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पालकी पर बैठकर माघी पूर्णिमा तक वहीं रहने की बात कह रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक प्रशासन संतों के स्नान को लेकर स्पष्ट और सम्मानजनक व्यवस्था नहीं करता, तब तक वे अपना विरोध जारी रखेंगे।