जब सरकार आम बजट पेश करती है, तो वह पूरे साल के खर्च और योजनाओं का एक अनुमान सामने रखती है। लेकिन हकीकत यह है कि साल भर में हालात बदल सकते हैं। कभी नई योजना शुरू करनी पड़ती है, तो कभी किसी विभाग को तय रकम से ज्यादा खर्च करना पड़ जाता है। ऐसे में सरकार सप्लीमेंटरी बजट लाती है, जिसे अनुपूरक बजट भी कहा जाता है।
सप्लीमेंटरी बजट का मतलब है—आम बजट के बाद अतिरिक्त धन की मांग। यह तब पेश किया जाता है, जब सरकार को लगता है कि पहले से तय बजट किसी खास जरूरत के लिए पर्याप्त नहीं है। उदाहरण के तौर पर, प्राकृतिक आपदा, स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ा खर्च या किसी नई विकास योजना के लिए अचानक धन की आवश्यकता पड़ सकती है।
यह समझना जरूरी है कि सप्लीमेंटरी बजट कोई नया सालाना बजट नहीं होता। इसमें न तो सरकार अपनी टैक्स नीति बदलती है और न ही बड़े आर्थिक सुधारों की घोषणा करती है। इसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि जरूरी खर्चों के लिए अतिरिक्त राशि की अनुमति ली जा सके।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 115 के तहत सरकार को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह विधानसभा के सामने सप्लीमेंटरी डिमांड फॉर ग्रांट्स रख सके। यानी सरकार को यह बताना होता है कि अतिरिक्त पैसा क्यों चाहिए और वह कहां खर्च किया जाएगा। विधानसभा की मंजूरी के बिना इस बजट को लागू नहीं किया जा सकता।
आम बजट पूरे वित्तीय वर्ष की दिशा तय करता है, जबकि सप्लीमेंटरी बजट रास्ते में आई जरूरतों को संभालने का काम करता है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि आम बजट एक साल का पूरा प्लान है और सप्लीमेंटरी बजट उस प्लान में जरूरी सुधार या अतिरिक्त खर्च की व्यवस्था।