Uttar Pradesh, उत्तर प्रदेश: राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेते हुए आधार कार्ड को जन्म तिथि या जन्म प्रमाण के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया है। योजना विभाग के विशेष सचिव अमित बंसल द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि आधार कार्ड के साथ कोई जन्म प्रमाणपत्र संलग्न नहीं होता, इसलिए इसे किसी भी सरकारी प्रक्रिया में जन्म तिथि के प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता। यह फैसला खासकर उन गरीब एवं वंचित तबकों के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है, जिनके पास आधार ही प्रमुख पहचान दस्तावेज है।
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब राज्य में एसआईआर (स्पेशल इंटेलिजेंस रिव्यू) प्रक्रिया चल रही है। इस प्रक्रिया में अगले चरण में जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाएंगे, उनसे जन्म तिथि का प्रमाण मांगा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट पहले ही चुनाव आयोग को आधार को “बारहवें दस्तावेज़” के रूप में शामिल करने की सलाह दे चुका है, लेकिन यूपी सरकार का यह ताजा आदेश अब एक बड़ा तकनीकी विरोधाभास पैदा करता है।
एसआईआर पर पड़ेगा सीधा असर
यूपी सरकार के निर्णय का सीधा असर एसआईआर के अगले चरण पर पड़ेगा। जिन लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट या शैक्षणिक प्रमाणपत्र नहीं हैं, उनके लिए आधार ही एकमात्र दस्तावेज था। अब आधार को अमान्य करने से उनका आवेदन अधर में लटक सकता है। उत्तर प्रदेश में लगभग 24.05 करोड़ आधार कार्ड धारक हैं, जो राज्य की कुल आबादी का 93.58% है। ग्रामीण क्षेत्रों में जन्म पंजीकरण पहले से ही बेहद कम है, ऐसे में यह फैसला करोड़ों लोगों के लिए गंभीर परेशानी ला सकता है।
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य की जन्म प्रमाणपत्र व्यवस्था को अव्यवस्थित बताया था, जहां एक ही व्यक्ति के दो अलग-अलग जन्म प्रमाणपत्र जारी होने के मामले सामने आए थे। ऐसे में, जन्म तिथि के लिए केवल प्रमाणपत्र पर निर्भरता लाखों लोगों को भ्रष्टाचार और जटिल कागजी कार्यवाही की तरफ धकेल सकती है।
क्या यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा?
चुनाव आयोग हमेशा से आधार को नागरिकता का प्रमाण मानने से इनकार करता रहा है। बिहार SIR के दौरान आयोग ने कहा था कि आधार का उपयोग केवल पहचान के लिए हो, वोटिंग राइट्स के लिए नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि एक समय सरकारी योजनाओं—जैसे PDS, मनरेगा और पेंशन—के लिए आधार अनिवार्य कर दिया गया था। अब, सुप्रीम कोर्ट और आयोग द्वारा इसकी उपयोगिता सीमित करने के बाद केंद्र और यूपी की भाजपा सरकार का रुख अचानक बदलता हुआ नजर आ रहा है।
आलोचक पूछ रहे हैं कि जब आधार को “राष्ट्रीय पहचान” का दर्जा देकर प्रचारित किया गया था, तो अब इसे जन्म तिथि प्रमाण से बाहर क्यों किया जा रहा है? क्या यह डेटा गोपनीयता, कृषि आंदोलन के बाद राजनीतिक जोखिम या वोट बैंक की रणनीति से जुड़ा फैसला है?
महाराष्ट्र भी कड़ा कदम उठा चुका है
महाराष्ट्र सरकार पहले ही जन्म प्रमाणपत्र के लिए आधार को अमान्य घोषित कर चुकी है। अगस्त 2023 में संशोधन के बाद सभी आधार-आधारित जन्म प्रमाणपत्र रद्द किए जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि यह निर्णय फर्जी प्रमाणपत्र रोकने के लिए जरूरी था।
1.3 लाख करोड़ खर्च — अब सवालों के घेरे में आधार
UIDAI ने आधार सिस्टम विकसित करने में लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे। 99.9% कवरेज का दावा करने के बावजूद UIDAI आज खामोश है कि कितने लोगों के पास आधार के अलावा अन्य दस्तावेज हैं। कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इतना बड़ा डिजिटल इकोसिस्टम बिना स्पष्ट नीति के अधर में लटकता दिख रहा है।
सबसे ज्यादा परेशानी गरीबों को
जिनका जन्म घर पर हुआ और जिन्होंने कभी जन्म पंजीकरण नहीं कराया, लेकिन आधार बन चुका है — अब उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे। जन्म प्रमाणपत्र बनवाने की लंबी प्रक्रिया, रिश्वत का जोखिम और समय की बर्बादी निश्चित रूप से गरीबों के लिए नई मुसीबत खड़ी करेगी।