दहेज के लालच ने विवाह की मर्यादा छीनी: सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दहेज प्रथा पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाह जैसी पवित्र संस्था आज दहेज की कुप्रथा के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि विवाह अपने वास्तविक स्वरूप में आपसी विश्वास, सम्मान और साथ निभाने का बंधन है, लेकिन आज यह पवित्र रिश्ता दुर्भाग्य से एक “व्यावसायिक लेन-देन” बन गया है। कोर्ट के इस रुख ने समाज में बढ़ती दहेज प्रथा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

पीठ ने कहा कि दहेज को आमतौर पर उपहार या स्वैच्छिक भेंट के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन असलियत में यह सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने, भौतिक लालसा पूरी करने और आर्थिक भार थोपने का माध्यम बन चुका है। अदालत ने कहा, “दहेज की बुराई सिर्फ एक परिवार का मामला नहीं, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ अपराध है। यह न केवल विवाह जैसी पवित्र परंपरा की मर्यादा को नष्ट करता है, बल्कि महिलाओं के उत्पीड़न को भी बढ़ावा देता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणियां उस मामले की सुनवाई के दौरान कीं, जिसमें एक व्यक्ति पर शादी के मात्र चार महीने बाद अपनी पत्नी को दहेज के लिए जहर देने का आरोप है। संबंधित व्यक्ति को हाई कोर्ट से मिली जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करते हुए कहा कि निचली अदालत ने “अपराध की गंभीरता, मृतका के dying declaration और दहेज हत्या संबंधी कानूनी प्रावधानों को नजरअंदाज किया है।”

पीठ ने दहेज हत्या को “सामाजिक कुप्रथा की सबसे भयानक अभिव्यक्ति” बताते हुए कहा कि कई युवतियों की जान केवल इसलिए चली जाती है क्योंकि परिवार उनके ससुराल वालों की अतृप्त लालच को पूरा नहीं कर पाता। कोर्ट ने कहा कि यह कुप्रथा विवाह की पवित्रता को नष्ट करती है और महिलाओं को मानसिक तथा शारीरिक उत्पीड़न का शिकार बनाती है।

अदालत ने आगे कहा कि ऐसी घटनाएं न केवल मानव गरिमा पर गहरा प्रहार करती हैं, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत दिए गए समानता व सम्मानजनक जीवन के मूल अधिकारों का भी उल्लंघन करती हैं। “दहेज हत्या जैसे अपराध यह दिखाते हैं कि समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है।”

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश दिया है कि दहेज हत्या या दहेज उत्पीड़न के मामलों में किसी भी प्रकार की ढिलाई स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी घटनाओं को केवल पारिवारिक विवाद या घरेलू मुद्दा कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह एक सामाजिक अपराध है और इसमें कठोर न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है।

अंत में कोर्ट ने कहा कि समाज को दहेज की बुराई के खिलाफ जागरूक होना होगा और विवाह को पुनः उसके पवित्र स्वरूप में स्थापित करना होगा, जहां सम्मान, समानता और विश्वास ही मुख्य आधार हों।

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