लखनऊ में 68 मध्यस्थ अधिवक्ताओं का 40 घंटे का प्रशिक्षण शुरू

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लखनऊ। प्रदेश में विवादों के त्वरित और सौहार्दपूर्ण समाधान को बढ़ावा देने के लिए लखनऊ में 68 मध्यस्थ अधिवक्ताओं का 40 घंटे का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ है। यह कार्यक्रम 13 से 17 अक्टूबर 2026 तक गोमती नगर स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (JTRI) में आयोजित किया जा रहा है।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यपालक अध्यक्ष एवं सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के संरक्षण और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण भंसाली के मार्गदर्शन में यह प्रशिक्षण आयोजित किया जा रहा है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा के निर्देश पर कार्यक्रम का संचालन किया जा रहा है।

विवादों के समाधान में मध्यस्थता अहम

सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता एवं सुलह परियोजना समिति (MCPC) के निर्धारित पाठ्यक्रम के तहत आयोजित इस प्रशिक्षण का उद्देश्य अधिवक्ताओं को मध्यस्थता के सिद्धांतों और व्यावहारिक प्रक्रियाओं की जानकारी देना है। इसके जरिए वाद-पूर्व विवादों और न्यायालयों में लंबित मुकदमों का आपसी सहमति से समाधान कराने पर जोर दिया जा रहा है।

मध्यस्थता के माध्यम से विवादों का निपटारा होने पर पक्षकारों का समय और संसाधन बचते हैं। साथ ही, आपसी बातचीत से समाधान निकलने पर संबंधों में सुधार और न्यायिक प्रक्रिया पर बोझ कम करने में भी मदद मिलती है।

सदस्य सचिव डॉ. मनु कालिया ने बताई मध्यस्थता की अहमियत

प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की सदस्य सचिव डॉ. मनु कालिया मौजूद रहीं। उन्होंने अधिवक्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि विवादों का त्वरित और सौहार्दपूर्ण समाधान सुनिश्चित करने तथा आम लोगों तक न्याय की आसान पहुंच बनाने में मध्यस्थता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

उन्होंने प्रशिक्षण के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए अधिवक्ताओं की सक्रिय भूमिका पर जोर दिया। इस कार्यक्रम के माध्यम से मध्यस्थ अधिवक्ताओं को ऐसे मामलों में प्रभावी समाधान निकालने के लिए तैयार किया जा रहा है, जिनमें आपसी सहमति से विवाद समाप्त किया जा सकता है।

प्रशिक्षण के बाद अधिवक्ताओं से अपेक्षा है कि वे उपयुक्त मामलों में मध्यस्थता के जरिए पक्षकारों के बीच समझौता कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इससे न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सरल, प्रभावी और समयबद्ध बनाने में मदद मिल सकती है।

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