दुर्गा शक्ति नागपाल के कंटेम्प्ट मामले से जुड़े नजूल भूमि विवाद में नया मोड़

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30 साल पुराने विवाद में बदलाव

गोंडा में आयुक्त कार्यालय और भवन के लिए आरक्षित नजूल भूमि से जुड़े करीब तीन दशक पुराने विवाद में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। वादी दयानंद मिश्रा ने अदालत में शपथपत्र देकर कहा है कि वह मामले में आगे पैरवी नहीं करेंगे और कार्यवाही समाप्त की जाए।

इसके साथ ही उन्होंने विवादित सरकारी जमीन से अपना कब्जा भी हटा लिया है। यह घटनाक्रम उस मूल भूमि विवाद से जुड़ा है, जिसके सिलसिले में देवीपाटन मंडल की आयुक्त और IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के विरुद्ध हाईकोर्ट में अवमानना संबंधी कार्यवाही की पृष्ठभूमि बनी थी।

किस जमीन का है मामला?

विवाद गोंडा में नजूल भूमि के भूखंड संख्या 514, 515, 524 और 525 से जुड़ा है। ये भूखंड आयुक्त कार्यालय और उससे संबंधित शासकीय भवन के लिए आरक्षित बताए गए हैं।

यह मुकदमा वर्ष 1997 से लंबित था। 2008 में इस मामले में स्थगन आदेश पारित हुआ था, जिसके बाद भी कानूनी कार्यवाही जारी रही। प्रशासन के सरकारी भूमि को अतिक्रमणमुक्त कराने के अभियान के दौरान यह पुराना प्रकरण फिर प्रमुखता से सामने आया।

अदालत में क्या दिया गया?

दयानंद मिश्रा ने अदालत के समक्ष एक शपथपत्र पेश किया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उसमें उन्होंने मुकदमे में आगे पैरवी न करने और कार्यवाही समाप्त करने का अनुरोध किया है।

मिश्रा के मामले से पीछे हटने के साथ ही विवादित स्थल से कब्जा हटाया जाना भी महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह है कि बदलाव केवल कानूनी पक्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जमीन की भौतिक स्थिति भी बदली है।

प्रशासन के सामने अब प्राथमिक जिम्मेदारी भूखंडों को दोबारा अतिक्रमण से बचाने और उन्हें उनके निर्धारित सरकारी उपयोग के लिए सुरक्षित रखने की है।

कंटेम्प्ट मामला क्यों उठा?

यह भूमि विवाद अगस्त में तब व्यापक चर्चा में आया, जब गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान ने आरोप लगाया कि अवकाश पर रहने के दौरान उन्हें दुर्गा शक्ति नागपाल की ओर से इस लंबित भूमि मामले को लेकर फोन कॉल आया था।

जज के आरोप के अनुसार, कॉल में उन पर मामले को लेकर दबाव बनाया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने आरोपों को गंभीर मानते हुए इस मुद्दे को आपराधिक अवमानना की कार्यवाही के लिए संबंधित पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया था।

नागपाल ने फोन कॉल किए जाने से इनकार नहीं किया, लेकिन उनका पक्ष यह रहा कि उन्होंने केवल जज के अवकाश की स्थिति जानने और वर्षों पुराने सरकारी भूमि प्रकरण में शीघ्र सुनवाई की आवश्यकता को लेकर संपर्क किया था। उनके अनुसार, भूमि आयुक्त कार्यालय भवन के लिए जरूरी थी।

अवमानना मामले की स्थिति

मूल नजूल भूमि विवाद में वादी के पीछे हटने और कब्जा हटने के बावजूद, इससे दुर्गा शक्ति नागपाल के खिलाफ चल रही अवमानना कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं होती।

अवमानना प्रकरण उस कथित फोन कॉल और न्यायिक अधिकारी पर प्रभाव डालने के आरोपों से संबंधित है, जबकि भूमि विवाद में नया घटनाक्रम मूल मुकदमे और जमीन के कब्जे से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, हाईकोर्ट में अवमानना मामले का अंतिम निर्णय अभी लंबित है।

सितंबर की शुरुआत में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने इस अवमानना मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था। इसलिए आगे की सुनवाई और अंतिम निर्णय सक्षम पीठ के समक्ष होना बाकी है।

कथित अवैध स्कूल की जांच

प्रशासनिक जांच में यह भी सामने आया था कि विवादित भूमि पर स्कूल संचालित होने का दावा किया गया था। प्रशासन ने स्थल की जांच कराई, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक मौके पर कोई छात्र और शिक्षक नहीं मिले।

यह तथ्य अब प्रशासन के लिए इस जमीन के वास्तविक उपयोग, कब्जे की प्रकृति और भविष्य में सरकारी प्रयोजन के लिए इसकी उपलब्धता तय करने में अहम हो सकता है।

दुर्गा शक्ति नागपाल ने क्या कहा?

दुर्गा शक्ति नागपाल ने कहा कि मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप शासकीय भूमि का संरक्षण और जनहित में उसका उपयोग प्राथमिकता है।

उनके अनुसार, लगभग 30 वर्षों से लंबित मामले में सरकारी भूमि कब्जामुक्त हुई है, संबंधित पक्ष ने अदालत में आगे पैरवी न करने का अनुरोध किया है और अब भूमि को सुरक्षित रखकर निर्धारित शासकीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाएगा। यह बयान प्रशासनिक कार्रवाई के संदर्भ में है; इससे अवमानना प्रकरण में किसी पक्ष की कानूनी जिम्मेदारी तय नहीं होती।

आगे क्या हो सकता है?

सिविल कोर्ट वादी के शपथपत्र और कार्यवाही समाप्त करने के अनुरोध पर आदेश दे सकती है।

प्रशासन भूखंडों का सीमांकन, सुरक्षा और रिकॉर्ड सत्यापन कर सकता है।

संबंधित नजूल भूमि को आयुक्त कार्यालय या अन्य स्वीकृत शासकीय उपयोग के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

हाईकोर्ट में अवमानना कार्यवाही अपने अलग कानूनी आधार पर आगे बढ़ेगी।

भूमि विवाद और अवमानना मामले में अंतिम कानूनी निष्कर्ष अदालत के आदेश से ही तय होंगे।

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