भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस के मौके पर नागपुर में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अपने संबोधन के दौरान ‘सेक्युलरिज्म’ को लेकर एक अहम टिप्पणी की, जिसने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
गडकरी ने कहा कि भारत में ‘सेक्युलर’ शब्द को अक्सर गलत तरीके से समझा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका वास्तविक अर्थ ‘सर्वधर्म समभाव’ है, न कि धर्म से पूरी तरह दूरी बना लेना। उनके अनुसार, एक व्यक्ति अपने धर्म और परंपराओं से जुड़ा रहता है, इसलिए वह पूरी तरह सेक्युलर नहीं हो सकता।
उन्होंने अपने तर्क को मजबूत करने के लिए इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के उदाहरण दिए। गडकरी ने कहा कि उनके निधन के बाद धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया गया था, जो यह दर्शाता है कि व्यक्ति अपनी आस्था से अलग नहीं हो सकता।
इस दौरान उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी का भी जिक्र किया और बताया कि उन्होंने हमेशा भारत की सेक्युलर पहचान को स्वीकार किया था। गडकरी के अनुसार, भारत की संस्कृति इतनी व्यापक और समावेशी है कि इसमें सभी धर्मों के लिए सम्मान की भावना स्वाभाविक रूप से मौजूद है।
गडकरी ने कहा कि असली सेक्युलरिज्म वही है, जिसमें सभी धर्मों और विचारों का सम्मान किया जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समाज में सद्भाव बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि लोग एक-दूसरे की आस्थाओं का आदर करें।
उन्होंने ब्रिटिश शासन काल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय भारतीय समाज में कई गलत अवधारणाएं डाली गईं, जिनका असर आज भी देखने को मिलता है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ लगाए जाने वाले आरोप वास्तविकता से दूर हैं।
गडकरी के इस बयान ने राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दी है, जहां ‘सेक्युलर’ शब्द की परिभाषा और उसके व्यावहारिक अर्थ पर चर्चा तेज हो गई है।