केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा घोषित 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने की समयसीमा अब एक बड़े राजनीतिक और सुरक्षा मूल्यांकन का विषय बन गई है। लोकसभा में सोमवार को इस मुद्दे पर विशेष चर्चा प्रस्तावित है, जिसमें सरकार के प्रयासों और उनकी सफलता पर विस्तार से मंथन होगा।
पिछले वर्ष संसद में अमित शाह ने स्पष्ट कहा था कि केंद्र सरकार नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए समयसीमा भी तय की गई है। इसके बाद से देशभर में विशेष रूप से नक्सल प्रभावित राज्यों में बड़े स्तर पर सुरक्षा अभियान चलाए गए हैं। इन अभियानों का असर अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है, जहां कई माओवादी नेताओं ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा का रास्ता अपनाया है।
लोकसभा की कार्यवाही के अनुसार, श्रीकांत शिंदे इस मुद्दे पर नियम 193 के तहत चर्चा की शुरुआत करेंगे। यह चर्चा न केवल सरकार की उपलब्धियों को सामने लाएगी, बल्कि विपक्ष के सवालों और सुझावों के जरिए आगे की रणनीति को भी दिशा देगी।
हाल के समय में सबसे बड़ी सफलता ओडिशा में देखने को मिली, जहां वांछित माओवादी नेता सुक्रू ने चार साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया। अधिकारियों के अनुसार, इन पर कुल 66 लाख रुपये का इनाम घोषित था। आत्मसमर्पण के दौरान एके-47, इंसास राइफल और अन्य हथियार भी जमा कराए गए, जो इस बात का संकेत है कि नक्सलियों की ताकत लगातार कमजोर हो रही है।
इसी तरह छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में भी बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जहां पप्पा राव जैसे वरिष्ठ माओवादी नेता ने 17 अन्य कैडरों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। यह क्षेत्र लंबे समय से नक्सल गतिविधियों का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन अब यहां संगठन की पकड़ ढीली पड़ती नजर आ रही है।
सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि अब कई क्षेत्रों में नक्सलियों की संख्या बेहद सीमित रह गई है। ओडिशा के कंधमाल जिले में तो केवल 8-9 सक्रिय सदस्य ही बचे होने की बात सामने आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में ऑपरेशन और तेज किए जाने की योजना है, ताकि तय समयसीमा के भीतर बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकें।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैन्य कार्रवाई से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास को भी उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी।