अयोध्या: सनातन परंपरा और आस्था के सर्वोच्च प्रतीक धर्मध्वज का आज राम मंदिर के शिखर पर प्रतिष्ठापन एक ऐतिहासिक और भावनात्मक क्षण बन गया। 500 वर्षों की लंबी प्रतिक्षा, संघर्ष, तपस्या और समाज के सामूहिक संकल्प के बाद यह दिवस सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर सनातन संस्कृति की प्रतिष्ठा का साक्षात प्रमाण बनकर उभरा है।
अवधपुरी का संत समाज इस दिव्य पल को सनातन गौरव का चरम क्षण मानते हुए भाव-विह्वल दिखाई दिया। उनका कहना है कि यह वही सपना है जिसकी कल्पना सदियों पूर्व संतों और भक्तों ने की थी। अनेक संघर्षों, बलिदानों और तपस्याओं से गुजरते हुए जिस क्षण की प्रतीक्षा की गई, आज वह क्षण साकार होकर असंख्य भक्तों के हृदय में अपार श्रद्धा और गर्व भर रहा है।
संतों का मानना है कि धर्मध्वज का राम मंदिर के शिखर पर आरोहण केवल एक परंपरा का निर्वाह नहीं बल्कि भारत की आध्यात्मिक विरासत की विजय है। यह ध्वज अब विश्वभर में सनातन धर्म की महिमा और मूल्य प्रणाली को और अधिक प्रखरता से स्थापित करेगा।
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संत समाज ने इस उपलब्धि को संभव बनाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका का विशेष उल्लेख किया। उनके अनुसार, डबल इंजन सरकार ने सनातन परंपराओं के संरक्षण, मंदिर संस्कृति के पुनरुद्धार, धार्मिक स्थलों पर सुविधाओं के विस्तार और संत समाज के सम्मान में अभूतपूर्व कार्य किया है। इससे भारतीय आध्यात्मिक चेतना को नई शक्ति और दिशा मिली है।
राम वैदेही मंदिर के प्रतिष्ठित संत दिलीप दास ने कहा कि अयोध्या मिशन के अंतर्गत जिस गति से सनातन संस्कृति का पुनरुद्धार हुआ है, वह अतुलनीय है। उनके अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि धर्म परंपरा के संरक्षक के रूप में लगातार प्रयासरत हैं।
विवाह पंचमी के अवसर पर आयोजित इस पावन कार्यक्रम में संत समाज द्वारा प्रभु श्रीराम और माता जानकी के दिव्य विवाह उत्सव का पूजन-अर्चन भी आयोजित किया गया।
संत समाज का विश्वास है कि धर्मध्वज की यह प्रतिष्ठा न केवल अयोध्या की आध्यात्मिक आभा को बढ़ाएगी, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य, सांस्कृतिक आत्मगौरव और सनातन समाज की एकता को भी और अधिक दृढ़ करेगी। यह क्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगा।