देश में गैस सिलेंडर की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिल रही है। जहां शहरों में गैस की बुकिंग और डिलीवरी को लेकर चिंता जताई जा रही है, वहीं गांवों में आज भी पारंपरिक ईंधन यानी गोबर के कंडों से चूल्हे जल रहे हैं।
ग्रामीण इलाकों में लकड़ी और गोबर के उपलों का इस्तेमाल वर्षों से किया जाता रहा है। समय के साथ गैस सिलेंडर भी गांवों तक पहुंचा, लेकिन कई परिवार अब भी कंडों पर ही निर्भर हैं। खासकर तब जब गैस की कीमतें बढ़ती हैं या सिलेंडर मिलने में देरी की खबरें आती हैं, तब ग्रामीण परिवारों के लिए कंडा एक भरोसेमंद विकल्प बन जाता है।
गांवों में पशुपालन आम बात है। गाय और भैंस से मिलने वाला गोबर महिलाओं के लिए उपयोगी संसाधन बन जाता है। महिलाएं गोबर में खेतों से निकले धान या गेहूं के अवशेष मिलाकर हाथ से कंडे तैयार करती हैं। इसके बाद इन्हें खुले में धूप में सुखाया जाता है। करीब एक सप्ताह से दस दिन के भीतर ये पूरी तरह सूखकर ईंधन के रूप में इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाते हैं।
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि कंडों पर खाना बनाना ज्यादा महंगा भी नहीं पड़ता। एक बार के भोजन के लिए करीब 10 कंडे और एक-दो लकड़ियां ही पर्याप्त होती हैं। इससे परिवार का भोजन आसानी से तैयार हो जाता है।
Bahraich जिले के मुकेरिया गांव की निवासी रीना देवी बताती हैं कि उन्होंने लंबे समय से गैस सिलेंडर का इस्तेमाल नहीं किया है। वह रोजाना पशुओं से मिलने वाले गोबर से कंडे बनाती हैं और उसी से खाना पकाती हैं। जरूरत पड़ने पर वह कंडों को बेचकर कुछ अतिरिक्त आमदनी भी कर लेती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह पारंपरिक तरीका आज भी लोगों की रसोई को चलाने में मदद कर रहा है। इससे न केवल ईंधन की समस्या का समाधान होता है बल्कि ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त खर्च से भी राहत मिलती है।