देश में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी के मामले लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। ठग कभी पुलिस अधिकारी तो कभी जांच एजेंसी का कर्मचारी बनकर लोगों को फोन या वीडियो कॉल पर डराते हैं और उनसे लाखों-करोड़ों रुपये ठग लेते हैं। अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने संदिग्ध बैंक लेन-देन को समय रहते रोकने और साइबर ठगी के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए नियम बनाने पर जोर दिया है।
मोबाइल पर कैसे हो सकती है गिरफ्तारी?
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सवाल उठाया कि लोग मोबाइल फोन के जरिए गिरफ्तारी की बात पर विश्वास कैसे कर लेते हैं।
पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत को बताया गया कि डिजिटल अरेस्ट के एक मामले में महिला को करीब 2.5 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठग लोगों को गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं। इसके बाद उन्हें पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसे मामलों में जागरूकता के साथ-साथ ठगी रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था की जरूरत पर अदालत ने जोर दिया।
संदिग्ध लेन-देन पर बैंक तुरंत करें कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर किसी खाते से अचानक ऐसा लेन-देन होता है, जो उसके पुराने रिकॉर्ड से बिल्कुल अलग है, तो बैंक उसकी जांच क्यों नहीं कर सकते?
अदालत का मानना है कि केवल ठगी होने के बाद शिकायत दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि संदिग्ध गतिविधियों को समय रहते पहचाना जाए और जरूरत पड़ने पर लेन-देन रोकने की कार्रवाई की जाए।
इससे लोगों की मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
बैंक की लापरवाही पर मिल सकता है मुआवजा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साइबर ठगी के मामलों में बैंकों की जवाबदेही तय करने पर भी जोर दिया। अदालत ने मुआवजे से जुड़े नियम बनाने की जरूरत बताई, ताकि वित्तीय संस्थानों की लापरवाही के कारण नुकसान उठाने वाले लोगों को राहत मिल सके।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर साइबर ठगी के मामले में बैंक को अपने आप पूरा पैसा लौटाना होगा। मुआवजे की जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित नियमों और मामले की परिस्थितियों को देखना होगा।
RBI से नियमों पर विचार करने को कहा
केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि बैंकों की जिम्मेदारी तय करने से जुड़ा मामला भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने RBI से साइबर ठगी के पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था पर विचार करने को कहा। अदालत ने अगली सुनवाई पर अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची पेश करने का निर्देश भी दिया।
सुनवाई में यह जानकारी भी सामने आई कि RBI केवाईसी यानी ग्राहक की पहचान से जुड़े नियमों में बदलाव के लिए प्रस्तावित निर्देशों पर काम कर रहा है।
साइबर ठगी से कैसे बचें?
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली ठगी से बचने के लिए कुछ जरूरी बातें ध्यान रखें:
- फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस अधिकारी बताने वाले अनजान व्यक्ति पर तुरंत भरोसा न करें।
- गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे मांगने पर रकम ट्रांसफर न करें।
- बैंक खाते, OTP, PIN और अन्य गोपनीय जानकारी किसी के साथ साझा न करें।
- ठगी होने पर तुरंत अपने बैंक और साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 से संपर्क करें।
- शिकायत के लिए आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in का इस्तेमाल करें।
डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की जवाबदेही और पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था पर ध्यान देने को कहा है। RBI से इस दिशा में नियमों पर विचार करने को भी कहा गया है। हालांकि, मुआवजे से जुड़े किसी भी प्रस्ताव को लागू नियम समझने से पहले आधिकारिक आदेश देखना जरूरी है। याद रखें, केवल फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे मांगना साइबर ठगी का बड़ा संकेत हो सकता है।