जनरल डायर की पोती के बयान की कैप्टन ने की निंदा

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published by saurabh

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अमृतसर, (वार्ता): पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए जिम्मेवार जनरल माइकल ओ डायर की पोती के उस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है जिसमें उसने जलियांवाला हत्याकांड को दंगों को दबाने के लिए की गई कार्रवाई करार दिया है। कैप्टन अमरिन्दर ने इस घटना को मानवता के विरुद्ध बहुत घिनौना अध्याय बताया और कहा कि इस बाग की ऐतिहासिक मौलिकता को बिगाड़ कर पेश नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उसी रूप में ही संभाले रखने की जरूरत है। उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में जलियांवाला बाग की घटना की महत्ता और ऐतिहासिक भूमिका की पुष्टि करते हुए कहा कि वह विद्वानों के शुक्रगुजार हैं जिन्होंने जलियांवाला बाग के स्वतंत्रता सेनानियों के महान संग्राम को आज़ादी की बड़ी घटना घोषित किया है। कैप्टन अमरिन्दर आज गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग की तरफ से जलियांवाला बाग को समर्पित जलियांवाला बाग का दुखांत (1919): इतिहास और साहित्य विषय पर करवाये गये वेबिनार में विशेष तौर पर बोल रहे थे। इस मीनार में जहां अलग-अलग प्रसिद्ध इतिहासकारों और विद्वानों ने अपने पर्चे पढ़े वहां इस मौके गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के उप कुलपति प्रो. जसपाल सिंह संधू ने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह का इस वेबिनार में हिस्सा लेने और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से अपने विचार व्यक्त करने पर धन्यवाद किया।

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कैप्टन ने इस वेबिनार में कहा कि ऐसे आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए लाभकारी सिद्ध होंगे जिससे उनको हमारे शहादत के विरसे से परिचित होने का मौका मिलेगा। उन्होंने इस वेबिनार की देश के 74वें आज़ादी दिवस पर करवाए जाने को ओर भी अच्छा बताते हुए कहा कि इससे देश और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा भेंट होगी। उन्होंने जनरल माइकल ओ डायर की पोती के उस बयान की सख़्त शब्दों में निंदा की जिसने अपने एक इंटरव्यू में जलियांवाला बाग को मानवता विरुद्ध घनौनी कार्यवाही की जगह पर केवल दंगों को दबाने की छोटी सी घटना बताया है। उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग की ऐतिहासिक घटना भारतीयों के जेहन में अहम स्थान रखती है और इसको सिर्फ़ छोटी सी दंगों को दबाने वाली घटना कहना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। जलियांवाला बाग के प्रति ऐसी सोच बदलनी चाहिए। उन्होंने शहीद ऊधम सिंह की शहादत का हवाला देते हुए उनके जज्बे को सलाम किया और कहा कि जिस तरीके से उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी की सौगंध को पूरा किया है वही जज्बा हमारे दिलों में जलियांवाला बाग के प्रति आज भी जीता रहना चाहिए। वेबिनार के दौरान गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी की तरफ से प्रकाशित पुस्तक रीइमेजिंग जलियांवाला बाग मासएक्कर (1919 -2019) जो कि प्रो. अमनदीप बल्ल की तरफ से संपादित की गई है, को भी रिलीज किया गया। इससे पहले इस वैबीनार दौरान अलग-अलग सत्रों में विद्वानों की तरफ से अपने विचार पेश किये गए। अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली के प्रो. सलिल मिश्रा ने जलियांवाला बाग की विरासत बारे में सवाल करते हुए बताया कि अंग्रेज़ों की तरफ से जलियांवाला बाग़ को किस तरह देखा गया। उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ इसे जलसा 1857 के नज़रिए से देख रहे थे। इस मन:स्थिति के साथ वह रौलट सत्याग्रह से हैरान थे और इस मानसिकता के अंतर्गत भारत में खास कर पंजाब हो रहे विद्रोह की स्थिति को देख रहे थे।

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